सत्यमेव जयते gideonhistory.com
प्राचीन भारत की भौगोलिक स्थिति
भारत का इतिहास इसके भूगोल के सामान्य ज्ञान के बिना समझा नहीं जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप उतना बड़ा है जितना रूस को छोड़ सारा यूरोप। इसका कुल क्षेत्रफल 4,202,500 वर्ग किलोमीटर है। यह उपमहाद्वीप पाँच देशों में बँटा है - भारत, बांगलादेश, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान। भारत की आबादी 86,00,00,000 के लगभग है। इसमें पच्चीस राज्य और सात केन्द्र शासित प्रदेश हैं। इसमें कई राज्य यूरोप के कई देशों में बड़े हैं जैसे, क्षेत्रफल में बिहार इंग्लैड के बराबर है और यूरोप के कई देश मध्य प्रदेश से छोटे हैं।
   भारतीय उपमहाद्वीप एक स्पष्ट भौगोलिक इकाई और इसका अधिकांश भाग उष्ण कटिबंध में पड़ता है। भारत के इतिहास में मानसून की महत्वपूर्ण भूमिका है। दक्षिण-पश्चिमी मानसून यहाँ जून से अक्टूबर तक चलता है और देश के अधिकांश क्षेत्र में विभिन्न मात्रा में पानी बरसता है। प्राचीन काल में सिंचाई किसी महत्व की वस्तु नहीं थी और खेती वर्षा पर ही निर्भर थी। आज जिसे हम उत्तर भारत में खरीफ फसल कहते हैं, वह प्राचीन काल में मुख्यतः दक्षिण-पश्चिमी मानसून पर आश्रित थी। उत्तर-पूर्वी मानसून यहाँ नवम्बर में तक बहता है। यह मुख्यतः प्रायद्वीपीय भारत में ही बरसता है जहाँ धान मुख्य फसल है। इससे उत्तर भारत में भी वर्षा होती है जहाँ गेहूँ, जौ आदि मुख्य फसलें हैं। जब से ईसा की पहली सदी से आसपास मानसून की दिशा मालूम हो गई, व्यापारी लोगों ने उत्तर-पश्चिमी मानसून के सहारे जहाजों पर सवार हो पश्चिम एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र से चलकर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया आना और फिर उत्तर-पूर्वी मानूसन के उतरने पर पश्चिम की ओर लौट जाना शुरू कर दिया। भारत मानसून के ज्ञान के फलस्वरूप पश्चिम एशिया, भूमध्यसागरीय क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार करने और सांस्कृतिक सम्पर्क स्थापित करने में समर्थ हो गया।
   भारत उत्तर में हिमालय से और शेष तीन दिशाओं में समुद्रों से घिरा है। हिमालय साइबेरिया से चलकर मध्य एशिया को पार करने वाली उत्तरधुव्रीय ठंडी हवाओं को रोकता है और इस प्रकार हमारे देश की रक्षा करता है। यही कारण है कि उत्तर भारत की जलवायु लगभग पूरे साल काफी गर्म रहती है। मैदानों में अधिक जाड़ा नहीं पड़ने से यहाँ के लोगों को बहुत अधिक कपड़े नहीं पहनने पड़ते और वे खुले में अधिक समय तक रह सकते हैं। दूसरे, हिमालय बहुत ऊँचा होने के कारण उत्तर से होने वाले हमलों से देश की रक्षा करता है। यह बात उन दिनों विशेष रूप से लागू थी जब औद्योगिक युग नहीं आया था और संचार-साधन इतने विकसित नहीं हुए थे। फिर भी उत्तर-पश्चिम में सुलेमान पर्वत श्रंखला, जो दक्षिण की ओर हिमालय-पर्वत, श्रंखला की कड़ी है, खैबर, बोलन और गोमल दर्रे से पार की जा सकती थी। दक्षिण की ओर सुलेमान पर्वत श्रंखला बलूचिस्तान में किर्तहार पर्वत श्रंखला से जुड़ी है, जिसे बोलन दर्रे से पार किया जा सकता था। इन दर्रों से भारत और मध्य एशिया के बीच प्रागैतिहासिक काल से ही आवागमन होता आया है। ईरान, अफगानिस्तान और सोवियत मध्य एशिया के अनेक लोग हमलावरों या आप्रवासियों के रूप में भारत आए और यहाँ से वहाँ गए। यहाँ तक कि हिमालय पर्वत-श्रृंखला का पश्चिमी विस्तार, जो हिन्दूकुश कहलाता है, सिन्धु और आक्सस के बीच अलंघ्य बाधा नहीं साबित हुआ। ये दर्रे एक ओर भारत और दूसरी ओर मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध के स्थापन में बड़े सहायक हुए हैं।
   हिमालय में ही कश्मीर और नेपाल की उपत्यकाएँ हैं। कश्मीर की घाटी चारों ओर से ऊँचे-उँचे पहाड़ों से घिरी हुई है। इससे उसने अपनी अलग तरह की जीवन-पद्धति विकसित कर ली। लेकिन यहाँ कई दर्रों द्वारा पहुँचा जा सकता था। इस घाटी में कड़ा जाड़ा पड़ता है, अतः यहाँ के अनेक लोगों को सर्दियों में नीचे मैदानों में उतर जाना पड़ता था और गर्मियों में मैदानों में भेड़-बकरी चराने वाले यहाँ चले आते थे। इस तरह मैदानों और इस घाटी के बीच आर्थिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान बना हुआ था। कश्मीर को मध्य-एशिया के इलाकों में बौद्ध धर्म के प्रचार का केन्द्र-स्थल बनने में पामीर का पठार कोई बाधक नहीं हुआ। नेपाल की घाटी आकार में छोटी है। गंगा के मैदानी इलाके के लोगों ने यहाँ पहुँचने के लिए अनेक दर्रे ढूँढ निकाले थे। कश्मीर की तरह इस घाटी में भी संस्कृत की उन्नति खूब हुई। दोनों ही उपत्काएँ संस्कृत हस्तलिपियों का सबसे बड़ा भंडार रही हैं।
   मैदानों की कछारी मिट्टी में पनपे घने जंगलों की अपेक्षा हिमालय की तराईयों के जंगलों को साफ करना आसान था। इन तराइयों में बहने वाली नदियाँ कम चौड़ी होती हैं अतः उन्हें पार करना कठिन न था। यही कारण है कि प्रारम्भिक यात्रा मार्ग हिमालय की तराइयों में पश्चिम से पूर्व और पूर्व से पश्चिम की ओर विकसित हुए। सम्भवतः इन्हीं कारणों से ईसा पूर्व छठी सदी में सबसे पुरानी कृषि-बस्तियाँ तराई वाले इलाकों में ही बनीं और यहीं के रास्ते व्यापार के लिए अपनाए गए।
   ऐतिहासिक भारत का वक्षस्थल उन नदियों का प्रदेश है जो उष्ण कटिबंधीय मानसूनी वर्षा से लबालब भरी रहती हैं। नदियों के ये प्रदेश हैं सिन्धु का मैदान, सिन्धु गंगा जलविभाजक, गंगा की घाटी और ब्रह्मपुत्र की घाटी। ज्यों-ज्यों हम पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हैं त्यों-त्यों पाते हैं कि वार्षिक वृष्टिमान क्रमशः 200 सेन्टीमीटर से बढ़ते-बढ़ते 250 सेंटीमीटर तक पहुँच जाता है। 25 से 37 सेन्टीमीटर वर्षा द्वारा पोषित सिन्धु प्रदेश के पेड़ पौधों को और संभवतः 37 से 60 सेन्टीमीटर वर्षा द्वारा पोषित पश्चिमी गंगाघाटी के पेड़ पौधों को भी पत्थर और ताँबे के औजारों से काटकर जमीन को कृषियोग्य बनाना संभव था। परन्तु 60 से 125 सेन्टीमीटर वर्षा द्वारा पोषित मध्य गंगा घाटी के जंगलों के बारे में ऐसा संभव नहीं था और 125 से 250 सेन्टीमीटर वर्षा से पोषित ब्रह्मपुत्र घाटी के जंगलों के बारे में तो कतई सम्भव नहीं था। घने जंगलों और साथ ही कठोर भूमि वाले इन प्रदेशों को साफ करना लोहे के औजारों से ही सम्भव था, परन्तु लोहे के औजार तो बहुत बाद में विकसित हुए। अतः प्राकृतिक सम्पदाओं का इस्तेमाल पहले पश्चिमी प्रदेश में ही किया गया और बड़ी बस्तियों का विस्तार आमतौर से पश्चिम से पूरब की ओर होता गया।
   सिन्धु और गंगा के मैदानों में शुरू हुई खेती से यहाँ बढ़िया फसल होने लगी और इसने एक के बाद एक कई संस्कृतियों का सम्भरण किया। सिन्धु और गंगा के पश्चिमी मैदानों में मुख्यतः गेहूँ और जौ की उपज होती थी, जबकि मध्य तथा निम्न गंगा मैदानों में मुख्यतः चावल पैदा किया जाता था। चावल गुजरात और विंध्य पर्वत के दक्षिण के लोगों का भी मुख्य भोजन बन गया। हड़प्पा संस्कृति का उद्भव और विकास सिन्ध की घाटी में हुआ, वैदिक संस्कृति का उद्भव पंजाब में हुआ और विकास पश्चिमी गंगा घाटी में। आदिकोत्तर संस्कृति, जो मुख्यतः लोहे के प्रयोग पर आश्रित थी, मध्य गंगा घाटी में फूली-फली। निम्न गंगा घाटी और उत्तरी बंगाल को वास्तव में गुप्त युग में उत्कर्ष मिला। अन्त में, असम सहित समूची ब्रह्मपुत्र घाटी को आरम्भिक मध्य युग में महत्व प्राप्त हुआ। प्रमुख शक्तियाँ इन घाटियों और मैदानों पर प्रभुत्व पाने के लिए आपस में लड़ती रहीं। इनमें भी ये शक्तियाँ गंगा-यमुना दोआब के लिए विशेष लोलुप रहीं और इसके लिए संघर्ष भी खूब हुए।
   नदियाँ वाणिज्य और संचार की मानो धमनियाँ हों। प्राचीन काल में सड़क बनाना कठिन था, इसलिए आदमियों और वस्तुओं का आवागमन नावों से होता था। अतः नदी-मार्ग सैनिक और वाणिज्य संचार में बड़े ही साधक हुए। अशोक द्वारा स्थापित प्रस्तर स्तम्भ नावों से ही देश के दूर-दूर स्थानों तक पहुँचाए गए। संचार-साधन के रूप में नदियों की यह भूमिका ईस्ट इंडिया कंपनी के दिनों तक कायम रही। इसके अलावा, नदियों की बाढ़ का पानी आसपास के क्षेत्रों में फैलता था और उन्हें उपजाऊ बनाता था। इन नदियों से नहरें भी निकाली गई थीं। किन्तु नदियों की भारी बाढ़ से हर साल उत्तरी मैदानों के गाँव और शहर तबाह हो जाते थे। इस प्रकार अनेक प्राचीन इमारतें बाढ़ों में बहकर नष्ट हो गईं। फिर भी हस्तिनापुर, प्रयाग, वाराणसी और पाटलिपुत्र जैसे अनेक नगर और राजधानियाँ नदी तट पर बसी थीं। आज कल नये शहरों की स्थापना रेल मार्गों या सड़कों के संगम पर की जाती है अथवा औद्योगिक या खान वाले क्षेत्रों में। लेकिन औद्योगिक युग के आरम्भ से पहले नगर अधिकतर नदी के तट पर ही स्थापित होते थे।
   सब से बढ़कर, नदियों ने राजनैतिक और सांस्कृतिक सीमाओं का काम किया है। यह काम पर्वतों ने भी किया है। उदाहरणार्थ, भारतीय प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में आज के उड़ीसा का समुद्रतटवर्ती प्रदेश जो कलिंग देश कहलाता था उसकी उत्तरी सीमा महानदी थी और दक्षिणी सीमा गोदावरी। इसी प्रकार आन्ध्रप्रदेश के उत्तर में गोदावरी और दक्षिण में कृष्णा है। इन दोनों नदियों के मुहानों के मैदान की ईसवी सन् के आरम्भकाल में अचानक ऐतिहासिक महत्व मिला। जब सातवाहनों और उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में यहाँ अनेक नगर और बन्दरगाह स्थापित हुए और अन्त में तमिलनाडु का अधिकतर भाग उत्तर में कृष्णा नदी और दक्षिण में कावेरी नदी से घिरा है। कावेरी घाटी दक्षिण मे वैगई नदी तक और उत्तर में पेन्नार नदी तक फैली हुई है। यह एक स्वतंत्र भौगौलिक क्षेत्र था और ईसवी सन् के आरम्भ के थोड़े पहले यहाँ चोल शासन स्थापित हुआ था। यह प्रदेश उत्तरी तमिलनाडु से अलग था। इस उत्तरी तमिलनाडु ने, जो उच्च भूमिवाला प्रदेश था, पल्लव शासन काल में ईसा की चौथी छठी सदियों में प्रसिद्धी पाई। इसके प्रायद्वीप का पूर्वी भाग कोरोमंडल समुद्रतट से घिरा हुआ है। यद्यपि पूर्वी घाट समुद्र तट रेखा के पार्श्व में ही है, तथापि ये अधिक ऊँचे नहीं हैं। पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों ने इनमें अनेक रास्ते बना दिए हैं। इसलिए प्राचीन काल में पूर्वी समुद्र तट तथा आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु के अन्य भागों के बीच आवागमन में कठिनाई नहीं थी, आरिकमेडु (आधुनिक नाम) महाबलिपुरम और कावेरी पट्टनम के बन्दरगाह कोरोमंडल पर ही अवस्थित थे।
   प्रायद्वीप के पश्चिमी भाग में ऐसी सुस्पष्ट प्रादेशिक इकाइयाँ नहीं हैं। परन्तु उत्तर में ताप्ती (दमन गंगा) और दक्षिण में भीमा के बीच का प्रदेश महाराष्ट्र के रूप में पहचाना जा सकता है। उत्तर में भीमा और ऊपरी कृष्णा तथा दक्षिण में तुंगभद्रा के बीच का प्रदेश कर्नाटक के रूप में पहचाना जा सकता है। तुंगभद्रा के उत्तर और दक्षिण में स्थित युद्धरत व्यक्तियों के बीच इस नदी ने लम्बे समय तक एक प्राकृतिक सीमा का काम किया। एक ओर बादामी के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों को तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में अपनी सत्ता फैलाने में कठिनाई हुई, तो दूसरी ओर पल्लवों और चोलों को इस नदी के उत्तर में राज्य-विस्तार करने में कठिनाई हुई। प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण-पश्चिम के तटीय प्रदेश में आजकल का केरल राज्य है। प्रायद्वीप का समुद्र तटवर्ती पश्चिमी भाग मालाबार तट कहलाता है जिसके तट पर कई बन्दरगाह और छोटे-छोटे राज्य स्थापित हुए, फिर भी इस तटीय प्रदेश और समीप के महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल प्रदेशों के बीच आवागमन में ऊँचे पश्चिमी घाट कठिनाइयाँ पैदा करते थे क्योंकि इनके दर्रों को पार करना आसान नहीं है।
   उत्तर में सिन्धु और गंगा की नदी-प्रणालियाँ और दक्षिण में विन्ध्यपर्वत श्रंखला, इन दोनों के बीच का विस्तृत प्रदेश अरावली पर्वतों द्वारा दो भागों में बंटा हुआ है। अरावली पर्वतों से पश्चिम का भू-भाग थार मरूभूमि में पड़ता है, हालाँकि राजस्थान का एक भाग भी मरूस्थल है। प्राचीन काल में इस विस्तृत मरूभूमि में बस्तियाँ संभव नहीं थीं। फिर भी इस मरूस्थल में कुछ उर्वर मरूद्यान थे, जहाँ कहीं-कहीं बस्तियाँ थीं और आरम्भ काल से ही ऊँटों के सहारे यह मरूभूमि पार करना संभव था। राजस्थान का दक्षिण पूर्वी भाग प्राचीन काल से ही अपेक्षाकृत उपजाऊ रहा है। इसके अलावा, खेत्री की ताँबे की खानें भी उसी क्षेत्र में होने से वहाँ ताम्र-पाषाण युग से ही बस्तियाँ बनती रही हैं।
   राजस्थान की सीमा गुजरात के उपजाऊ मैदानों में जा मिलती है। नर्मदा, ताप्ती, माही और साबरमती नदियाँ इस प्रदेश को पार करती हुई समुद्र में गिरती हैं। दक्खनी पठार के पश्मित्तर छोर पर स्थित इस गुजरात प्रदेश में कम वर्षा वाला क्षेत्र कठियावाड़ वाला प्रायद्वीप भी शामिल है। इस राज्य का तटीय क्षेत्र काफी दन्तुर होने के कारण यहाँ कई बन्दरगाह बने हैं। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही गुजरात समुद्रतटीय और विदेशी व्यापार के लिए प्रसिद्ध रहा है, और यहाँ के लोगों ने अपने को उद्यमशील व्यापारी सिद्ध किया है।
   गंगा-जमुना दोआब के दक्षिण में मध्य प्रदेश राज्य है, जो पश्चिम में चम्बल नदी, पूर्व में सोन नदी और दक्षिण में विन्ध्य पर्वत और नर्मदा नदी से घिरा है। इसके उत्तरी भाग में उपजाऊ मैदान है। आजकल मध्यप्रदेश हमारे देश का सबसे बड़ा राज्य है। यह मोटे तौर पर पूर्वी और पश्चिमी दो भागों में बाँटा जा सकता है। पूर्वी भाग को, जो ज्यादातर विन्ध्य पर्वत से घिरा हुआ है, गुप्त वंश के समय (ईसा की चौथी-पाँचवी सदियों) तक ऐतिहासिक महत्व नहीं मिलता था। परन्तु पश्चिमी मध्यप्रदेश में मालवा का वह भू-भाग शामिल है जो छठी सदी से ऐतिहासिक क्रियाकलापों का महत्व रहा है। गुजरात के बन्दरगाहों के लिए मालवा एक महत्वपूर्ण पश्च-क्षेत्र (पिछवाड़ा) था, और इसीलिए मालवा तथा गुजरात पर अधिकार स्थापित करने के लिए दक्कन और उत्तरी शक्तियों के बीच अनेक युद्ध हुए। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र पर अधिकार जमाने के लिए ईसा की पहली और दूसरी सदियों में शकों और सातवाहनों ने लडाइयाँ लड़ीं और अठारहवीं सदी में मराठों और राजपूतों ने भी ऐसी लड़ाइयाँ लड़ीं।
   नदियों द्वारा कहीं-कहीं पर्वतों द्वारा घिरा और कहीं-कहीं डेल्टा या पठार रूप वाला ऐसा प्रत्येक प्रदेश एक-एक राजनैतिक और प्रशासनिक इकाई था, जहाँ विभिन्न राजवंशों के शासन का उत्थान-पतन होता रहा। विशाल देश में यातायात की कठिनाइयों को और प्राकृतिक सीमाओं की मजबूती को देखते हुए शासक वर्ग के लिये यह आसान नहीं था कि अन्य सारे प्रदेशों पर भी अपना शासन स्थापित कर सके। शनैः-शनैः प्रत्येक प्रदेश ने एक ऐसी पृथक सांस्कृतिक इकाई का रूप धारण किया जिसकी अपनी-अपनी भाषा और जीवन-पद्धति थी। परन्तु उत्तरी और पश्चिमी भारत की अधिकांश भाषाएँ एक ही मूल आर्य भारतीय भाषा से विकसित हुई हैं और इसीलिए इनमें बहुत ही तात्विक समानता दिखाई देती है। एक और भी महत्व की बात है कि लगभग सारे देश में संस्कृत का विकास होने लगा और वह समझी जाने लगी।
   विन्ध्य पर्वत श्रंखला देश को पूरब से पश्चिम तक बीचों-बीच विभक्त करती है और इस प्रकार उत्तर भारत और दक्षिण भारत की विभाजक रेखा बनी हुई हैं। द्रविड़ भाषा बोलने वाले लोग विन्ध्य के दक्षिण में रहते और भारतीय आर्यभाषा बोलने वाले इसके उत्तर में। दोनों के बीच के विन्ध्य क्षेत्र में आदिवासी लोग रहते थे, जहाँ वे आज भी हैं। पश्चिमी और पूर्वी घाटों के तटवर्ती क्षेत्रों में आप्रवासी तथा व्यापारी लोग आ बसे। दक्षिण में विदेशी व्यापार खूब चला। विन्ध्य की यह सीमा अलंघ्य नही है। प्राचीन काल में संचार-व्यवस्था की कठिनाइयों के बावजूद उत्तर के लोग दक्षिण पहुँचते और दक्षिण के लोग उत्तर। परिणामतः संस्कृति और भाषा का आदान-प्रदान हुआ। उत्तर की शक्तियों ने बार-बार दक्षिण में प्रवेश किया और दक्षिण शासको ने उत्‍तर में। धर्म प्रचार को और सांस्कृतिक नेताओं, विशेषतः ब्राह्मणों पर भी यही बात लागू होती है। दोनों ओर का यह आवागमन निरन्तर जारी रहा और इसने एक संयुक्त संस्कृति के विकास में योग दिया।
   यद्यपि देश के अधिकांश प्रदेशों की अपनी सुनिश्चित प्राकृतिक सीमाएँ थीं, परन्तु पर प्रदेश में जीवन-यापन के लिए अपेक्षित समुचित सम्पदा नहीं थी। इसीलिए प्रागैतिहासिक काल से ही धातुओं और अन्य आम जरूरतों की पूर्ति के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में पारस्परिक सम्बन्धों का एक जाल बिछ गया था।
   प्राकृतिक सम्पदा के उपभोग का देश के इतिहास में एक विशिष्ट महत्व है। जब तक लोगों की बस्तियाँ बड़े पैमाने पर फैली नहीं थी, भारी वर्षा के बदौलत भारत के मैदानों का बहुत बड़ा हिस्सा घने जंगलों से भरा था। इन जंगलों से शिकार के अलावा पशुओं का चारा, ईंधन और लकड़ी प्राप्त होती थी प्राचीन काल में जब पकाई हुई ईंटों का अधिक इस्तेमाल नहीं होता था, लकड़ी के मकान और लकड़कोट बनाए जाते थे। इनके अवशेष पाटलिपुत्र में मिले हैं जहाँ देश की पहली प्रमुख राजधानी स्थापित हुई थी। मकान और औजार बनाने के लिए सभी किस्म का पत्थर, बलुआ पत्थर भी, देश में उपलब्ध था। सहज ही, भारत में सबसे पुरानी बस्तियाँ पहाड़ी इलाकों में और पहाड़ों के बीच की नदी घाटियों में स्थापित हुई थीं। ऐतिहासिक युगों में पत्थर के मन्दिरों और प्रस्तर-मूर्तियों का निर्माण उत्तर भारत के मैदानों की अपेक्षा दक्कन तथा दक्षिण भारत में अधिक संख्या में हुआ है।
   ताँबा देश भर में व्यापक रूप से बिखरा है। ताँबे की परम समृद्ध खानें छोटा नागपुर के पठार में विशेष कर सिंहभूमि जिले में पाई जाती हैं। ताँबे की यह पेटी 130 कि.मी. लम्बी है और पता चलता है कि प्राचीन काल में यहाँ से ताँबा निकाला जाता था। ताँबे के औजारों का इस्तेमाल करने वाले बिहार के सबसे पुराने निवासियों ने सिंहभूमि और हजारीबाग की ताँबे की इन खानों का उपयोग किया था। दक्षिण बिहार और मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में ताँबे के बहुत से औजार मिले हैं। ताँबे के विपुल भंडार राजस्थान के खेत्री खानों में भी मिले हैं। इनका उपयोग पाकिस्तान, रहने वाले प्राक् वैदिक और वैदिक दोनों ही लोगों ने किया है। खेत्री इलाके में ताँबे के बहुत से सेल्ट (आदिम कुल्हाडे़) पाए गए हैं और वे लगभग 1000 ई. पू. से पहले की अवधि के प्रतीत होते हैं। चूँकि ताँबा उपयोग में लाई गई पहली धातु थी इसलिए हिन्दू इस धातु को पवित्र मानने लगे और ताम्र पात्रों का धार्मिक अनुष्ठानों में व्यवहार होने लगा।
   आज हमारे देश में टिन का उत्पादन नहीं होता है। प्राचीन काल में भी यह धातु कम ही उपलब्ध थी। कुछ साक्ष्य मिलते हैं कि धातु राजस्थान और बिहार में पाई जाती थी, परन्तु अब इसके भंडार समाप्त हैं। चूँकि ताँबे और टिन को मिलाने से ही काँसा बनता है, इसलिये हमें प्रागैतिहासिक काल की काँस्य वस्तुएँ अधिक नहीं मिलतीं। हड़प्पा संस्कृति के लोग सम्भवतः राजस्थान से कुछ टिन प्राप्त करते थे, परन्तु वे टिन का आयात मुख्यतः अफगानिस्तान से करते थे और वह भी सीमित मात्रा में ही। यही कारण है कि हड़प्पाई लोग काँसे के औजारों का प्रयोग तो करते थे लेकिन यहाँ पर ऐसे औजार पश्चिमी एशिया, मिश्र और क्रीट की अपेक्षा कम ही मिले हैं और जो मिले हैं उनमें टिन का अनुपात कम है। अतः भारत के अधिकतर हिस्से में वास्तव में काँस्य-युग, अर्थात ऐसा युग जिसमें औजार और हथियार अधिकतर काँसे के होते, आया ही नहीं। ईसवी सन् के आरम्भ आरम्भिक शतकों से ही भारत का घना सम्पर्क बर्मा और मलय प्रायद्वीपों के साथ कायम हुआ, जहाँ टिन के विपुल भंडार हैं। फलस्वरूप बड़ी मात्रा में काँसे का इस्तेमाल होने लगा, विशेषतः दक्षिण भारत में बनने वाली देवप्रतिमाओं में। बिहार में मिली पालकालीन कांस्य प्रतिमाओं के लिए टिन सम्भवतः हजारीबाग और रांची से प्राप्त किया गया था, क्योंकि हजारीबाग में पिछली सदी के मध्यकाल तक टिन के अयस्क को गलाने का काम होता था।
   भारत लौह अयस्क में समृद्ध रहा है। यह मुख्यतः दक्षिण बिहार, पूर्वी मध्य प्रदेश और कर्नाटक में पाया जाता है। एक बार अयस्क गलाने की विधि, धौंकनी का इस्तेमाल (इस्पात बनाने की कला) सीख लेने पर, युद्ध के काम में लोहे का प्रयोग करना संभव हो गया। परन्तु लोहा इससे कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ जंगल को साफ करने मे और गहरी और नियमित खेती करने में। मगध में ईसा पूर्व छठी-चौथी सदियों में जो पहला साम्राज्य स्थापित हुआ उसका प्रमुख कारण यही बताया जाता है कि इस प्रदेश के ठीक दक्षिण में लोहा उपलब्ध था। बड़े पैमाने पर लोहे का उपयोग करके ही अवन्ति, जिसकी राजधानी उज्जयिनी में थी, ईसा पूर्व छठी-पाँचवी सदियों का एक और महत्वपूर्ण राज्य बन पाई थी। सातवाहनों ने और विन्ध्य के दक्षिण में उदित हुई अन्य सत्ताओं ने भी शायद आन्ध्र और कर्नाटक के लौह-अयस्कों का इस्तेमाल किया था।
   आन्ध्रप्रदेश में सीसा भी मिलता है। यही कारण है कि ईसा की दो आरंभिक सदियों में आन्ध्र और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों पर शासन करने वाले सातवाहनों ने बड़ी संख्या में सीसे के सिक्के, जारी किये थे। सीसा राजस्थान के जोवार से भी प्राप्त किया गया होगा। हमारे देश के सबसे पहले के सिक्के, जिन्हें आहत (या पंच मार्क्ड) सिक्के कहते हैं, मुख्यतः चाँदी के हैं, यद्यपि देश में यह धातु विरल मिलती है। परन्तु प्राचीन काल में मुंगेर जिले की खड़कपुर पहाड़ियों में चाँदी की खानें मौजूद थीं। अकबर के समय तक इन खानों के उल्लेख मिलते हैं। यही कारण है कि बिहार में मिले सबसे पुराने आहत सिक्के चाँदी के हैं।
   प्रचुर स्वर्णकण नदी-धाराओं से बने जमावों से बीने जाते थे, जहाँ वे हिमालय से जल-धाराओं में बहकर मैदानों में आते थे। ऐसे जमावों को प्लेसर्स कहते हैं। सोना कर्नाटक की कोलार खानों में मिलता है। सोने का सबसे पुराना अवशेष 1800 ई. पू. के आसपास के कर्नाटक के एक नवपाषाण युगीन स्थल से मिला है। इन खानों से सोना निकाले जाने के बारे में हमें ईसा की दूसरी सदी के आरम्भ तक कोई जानकारी नहीं मिलती। कोलार दक्षिण कर्नाटक के गंगवंशियों की प्राचीनतम राजधानी माना जाता है। प्राचीन काल में उपयोग में लाया गया अधिकांश सोना मध्य-एशिया और रोमन साम्राज्य से प्राप्त किया गया था। इसलिए स्वर्णमुद्रा का नियमित प्रचलन ईसा की आरंभिक पाँच सदियों में हुआ था। पर, लम्बी अवधि तक स्वर्ण मुद्रा चलाते रहने के लिए यहाँ पर्याप्त स्रोत नहीं था, इसलिए बाहर से सोने का आयात बन्द होते ही स्वर्ण-मुद्रा दुर्लभ होती गई।
   प्राचीन भारत में, विशेषतः मध्य-भारत के उड़ीसा और दक्षिण भारत में भाँति-भाँति के रत्नों और मोतियों का भी उत्पादन होता था। ईसा की आरंभिक सदियों में रोमन लोग भारत की जिन व्यापार-वस्तुओं के लिए लालायित रहते थे उनमें रत्नों का प्रमुख स्थान था।