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दक्षिणी भारत में इतिहास का प्रारम्भ
महापाषाणिक पृष्ठभूमिकई वस्तुएँ इतिहास में नए काल-खंड के आरम्भ की सूचना देती हैं। ये हैं - फालवाले हल से खेती करने वाले ग्रामीण समुदायों का बड़े पैमाने पर बसना, राज्यतंत्र का गठन, सामाजिक वर्गों का पनपना, लेखन-कला का प्रचलन, लिखित साहित्य का आरम्भ। इनमें से कोई भी वस्तु भारतीय प्रायद्वीप के नुकीले भाग में (जिसका केन्द्रस्थल है कावेरी डेल्टा अंचल) ईसा-पूर्व दूसरी सदीं तक नहीं पाई जाती है। इस समय तक इस प्रायद्वीप के उच्च भागों में वे लोग बसते थे जो महापाषाण निर्माता (मेगालिथ बिल्डर) कहलाते हैं। उनका पता हमें उनकी यथार्थ बस्तियों से नहीं चलता, जो बहुत ही कम मिलती हैं, बल्कि उनकी कब्रों से चलता है जो महापाषाण कहलाती हैं। इन कब्रों को महापाषाण इसलिए कहते हैं कि इन्हें बड़े-बड़े पत्थरों के टुकड़ों से घेर दिया जाता था। इन कब्रों में दफनाए गए लोगों के न केवल अस्थिपंजर ही बल्कि मृद्भांड और लोहे की वस्तुएँ भी मिलती हैं। वे लोग कई तरह के मृद्भांडों का प्रयोग करते थे जिन में लाल मृद्भांड भी शामिल हैं। लेकिन काला और लाल मृदभांड उन लोगों में अधिक प्रचलित मालूम पड़ते हैं। अवश्य ही, शव के साथ कुछ वस्तुओं को भी दफनाने की प्रथा इस विश्वास पर चली होगी कि मृतात्मा को परलोक में उन सभी वस्तुओं की आवश्यकता होगी। इन वस्तुओं से हमें उन की जीविका के स्रोतों का आभास मिलता है। हम उनके बाणाग्र, बरछे की नोक, फावड़े तथा हँसिया पाते हैं। ये सभी लोहे के बने हैं। महापाषाण कब्रों में त्रिशूल भी पाते हैं जो बाद में शिव के साथ जुड़ गया। फिर भी इन कब्रों में खेती के औजार कम पाते हैं, लड़ाई और शिकार के हथियार अधिक। इससे लक्षित होता है कि महापाषाणिक लोग उन्नत खेती नहीं करते थे।महापाषाणिक लोग प्रायद्वीप के सारे ऊँचे इलाकों में पाए जाते हैं, लेकिन जमाव पूर्वी आन्ध्र और तमिलनाडु में अधिक प्रतीत होता है। उनका आरम्भ लगभग 1000 ई. पू. से माना जा सकता है, लेकिन कई मामलों में महापाषाण अवस्था ईसा-पूर्व पाँचवीं सदी से लेकर ईसा-पूर्व पहली सदी तक कायम रही मालूम पड़ती है। कुछ मामलों में तो यह अवस्था ईसा सन् की आरम्भिक सदियों तक टिकी-सी लगती है। अशोक के अभिलेखों में उल्लिखित चोल, पाण्ड्य और केरलपुत्र (चेर) शायद भौतिक संस्कृति की उत्तर महापाषाणिक अवस्था के लोग थे। तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों में रहने वाले महापाषाणिक लोगों में कुछ अजीब लक्षण पाए जाते हैं। वे मृतकों के अस्थिपंजर को लाल कलश में डालकर गड्ढों में दफनाते थे। कई मामलों में ये अस्थिपंजर पत्थरों से घिरे नहीं थे और दफन की वस्तुएँ अधिक नहीं थी। यह कलश-शवाधान परिपाटी पत्थर के घेरेवाले ताबूत शवाधान या गर्त शवाधान की परिपाटी से भिन्न हैं, जो कृष्णा-गोदावरी घाटी में प्रचलित थी। परन्तु जो भी हो, लोहे के प्रयोग के बावजूद ये महापाषाणिक लोग अंशतः बसने के लिए और अंशतः शवों को दफनाने के लिए पहाड़ियों की ढलानों पर आश्रित रहते थे। महापाषाणिक लोग धान और रागी उपजाते थे, परन्तु उनकी खेती बहुत ही कम जमीन पर होती थी और वे घने जंगलों से छाए रहने के कारण मैदानों या निम्न भूमियों में बस नहीं पाए। राज्य का बनना और सभ्यता का उदयईसा सन् के आरम्भ के साथ या सम्भवतः उससे कुछ पहले, ये लोग ऊँची भूमि से उतरकर उर्वर नदी घाटियों में आए और कछारी डेल्टा क्षेत्रों को तोड़कर कृषि योग्य बनाया। बहुत सारे व्यापारी और विजेता लोग तथा जैन, बौद्ध और कुछ ब्राह्मण धर्मप्रचारक लोग उत्तर से आकर प्रायद्वीप के छोर तक पहुँचे। उनके साथ आई भौतिक संस्कृति के बहुत से तत्वों के साथ इन महापाषाण लोगों का सम्पर्क हुआ। इस सम्पर्क से प्रेरित होकर इन्होंने पानी में धान की खेती की परिपाटी अपनाई, अनेकों गाँव और नगर बसाए और उनके बीच भी सामाजिक वर्ग बन गए। उत्तर और सुदूर दक्षिण, जो तमिलकम और तमिषकम कहलता है, दोनों के बीच संस्कृति और आर्थिक संबंध की स्थापना ईसा-पूर्व चौथी सदी से नितान्त महत्वपूर्ण हो गई। दक्षिणापथ अर्थात् दक्षिण को जाने वाला रास्ता उत्तर वालों के लिए मूल्यवान सिद्ध हुआ क्योंकि दक्षिण से उन्हें सोना, मोती और विविध रत्न प्राप्त होते थे। पाटलिपुत्र में रहने वाले मेगास्थनीज को पाण्ड्य देश मालूम था। आरम्भिक संगम ग्रन्थ के लेखकों को गंगा और सोन नदी ज्ञात थीं और मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र भी ज्ञात था। अशोक के अभिलेखों में साम्राज्य की सीमा पर बसने वाले चोलों, पाण्ड्यों, केरलपुत्रों और सतियपुतों का उल्लेख है, जिनमें केवल सतियपुतों की पहचान अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। ताम्रपणियों या श्रीलंका के निवासियों का भी उल्लेख है। अशोक की उपाधि “देवों का प्यारा” को एक तमिल राजा ने अपनाया। ये सब धर्म और संस्कृति के संक्रमण का परिणाम था, जो अपने अनुयायियों सहित आए जैनों, बौद्धों आजीवकों और ब्राह्मणों के तथा व्यापारियों के कार्यकलापों से उत्पन्न हुआ। यह एक महत्व की बात है कि अशोक के अभिलेख मुख्य-मुख्य महामार्गों पर स्थापित किए गए। आरम्भिक अवस्था में ही गंगा मैदान की संस्कृति का बहुत कुछ प्रभाव, उन नास्तिक सम्प्रदायों के कार्यकलाप के जरिए, जिनका उल्लेख हमें प्राचीनतम् तमिल ब्राह्मी अभिलेखों में मिलता है, भली-भाँति महसूस किया जा चुका था। ब्राह्मणिक प्रभाव भारी मात्रा में तमिलकम में भी पहुँचा परन्तु ऐसा वास्तव में ईसा की चौथी सदी में आकर हुआ। कालक्रमेण, तमिल संस्कृति के भी बहुत से तत्व उत्तर में फैले और ब्राह्मण धर्म संबंधी ग्रन्थों में कावेरी की गणना देश की पवित्र नदियों में होने लगी।दक्षिण में जो तीन-तीन राज्य बने वह तब तक सम्भव न हुआ होगा जब तक कि जंगल को काटकर साफ करने और जोतकर खेती करने के काम को आसान बनाने वाले लोहे का कौशल फैला न होगा। जनपद टाइप और मगध साम्राज्य टाइप की आहत मुद्राओं के बिखराव के अध्ययन से भी उत्तर-दक्षिण व्यापार के विकास का आभास मिलता है। चोल, चेर और पांड्य इन तीनों राज्यों के उदय में रोमन साम्राज्य के साथ बढ़ते हुए व्यापार का भी हाथ है। ईसा की पहली सदी से ही ये तीनों जन उस आयात-निर्यात व्यापार से लाभ उठाते रहे जो एक ओर दक्षिण भारत के समुद्रतटवर्ती प्रदेश और दूसरी ओर रोमन साम्राज्य के पूर्वी उपनिवेशों के खासकर मिश्र के बीच चलता रहा। तीन आरम्भिक राज्यभारतीय प्रायद्वीप का दक्षिणी छोर, जो कृष्णा नदी के दक्षिण में पड़ता है, तीन राज्यों मे विभक्त था - चोल, पाण्ड्य और चेर या केरल। पाण्ड्यों का उल्लेख सर्वप्रथम मेगास्थनीज ने किया है। उसने कहा है कि उनका राज्य मोतियों के लिए मशहूर है। उसने यह भी बताया कि इस राज्य का शासन का स्त्री के हाथ में है, जिससे यह लक्षित होता है कि पाण्ड्य समाज में कुछ मातृतन्त्रात्मक प्रभाव था।पांड्य राज्य भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी भाग में था और उसमें मोटे तौर पर तमिलनाडु के आधुनिक तिन्नवेल्ली, रामनद और मदुरा जिले शामिल हैं। उसकी राजधानी मदुरा में थी। ईसा की आरम्भिक सदियों में तमिल-परिषदों में संकलित साहित्य जो संगम नाम से विख्यात है उसमें पांड्य राजाओं का उल्लेख है, किन्तु उसमें कोई क्रमबद्ध विवरण नहीं है। एक दो पांड्य विजेताओं का उल्लेख है। फिर भी संगम साहित्य से प्रकट होता है कि यह देश धनवान और समृद्धिवान था। पांड्य राजाओं को रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार में लाभ होता था और उन्होंने रोमन सम्राट ऑगस्टस के दरबार में राजदूत भेजे। ब्राह्मणों का अच्छा स्थान था। पांड्य राजा ने ईसा की आरम्भिक सदियों में वैदिक यज्ञ किए। चोल राज्य मध्य काल के आरम्भ में चोल मण्डलम् (कोरोमंडल) कहलाता था। यह पेन्नार और वेलार नदियों के बीच में पाण्ड्य राज्यक्षेत्र के पूवोत्तरकोण में था। हमें संगम साहित्य से चोलों के राजनैतिक इतिहास का कुछ आभास मिलता है। उनकी राजनीतिक सत्ता को केन्द्र उरेऊ था जो कपास के व्यापार के लिए मशहूर है। लगता है कि ईसा-पूर्व दूसरी सदी के मध्य में एलारा नामक एक चोल राजा ने श्रीलंका पर विजय की और लगभग 50 वर्षों तक वहाँ शासन किया। चोलों का इतिहास ईसा की दूसरी सदी से आरम्भ होता है जब वहाँ का प्रख्यात राजा कारिकाल का आगमन होता है। उसने पुहार की स्थापना की और कावेरी नदी के किनारे 160 किलोमीटर लम्बा बाँध बनाया। इसका निर्माण 12,000 गुलामों से कराया गया, जिन्हें श्रीलंका से बन्दी बनाकर लाया गया था। पुहार की पहचान कावेरी पट्टनम से की गई है, जो चोलों की राजधानी थी। यह व्यापार और वाणिज्य का बहुत बड़ा केन्द्र था और उत्खननों से पता चला है कि उसका गोदीबाड़ा (डॉक) बहुत विशाल था। चोलों के वैभव का एक मुख्य स्रोत सूती कपड़े का व्यापार था। उनके पास कुशल नौसेना भी थी। कारिकाल के उत्तराधिकारियों के समय चोल सत्ता का तेजी से हृास हुआ। उनकी राजधानी पर चढ़ाई कर उसे ध्वस्त कर दिया गया। दो पड़ोसी शक्ति चेरों और पाण्ड्यों ने चोलों के राज्य में घुसकर अपना-अपना राज्य फैलाया। चोलों की जो भी बची खुची सत्ता रह गई उसे उत्तर से पल्लवों ने हमला कर निकाल बाहर कर दिया। ईसा की चौथी से नौवीं सदी तक के दक्षिण भारतीय इतिहास में चोलों की भूमिका नगण्य रही। चेर या केरल देश पाण्ड्य देश के पश्चिम और उत्तर में था। उसमें समुद्र और पहाड़ों के बीच की एक सँकरी सी पट्टी पड़ती थी। उस में आधुनिक केरल राज्य का और तमिलनाडु का अंश था। ईसा की आरम्भिक सदियों में चेर देश का महत्व उतना ही था जितना चोलों और पाण्ड्यों का। चोलों का यह महत्व रोमन लोगों के साथ व्यापार के कारण था। रोमनों ने अपने हित की रक्षा के लिए सेना की दो टुकडियाँ मुजिरी में स्थापित की थीं, जो चेर देश के द्रांगनोर से अभिन्न है। कहा जाता है कि उन्होंने वहाँ ऑगस्टस का एक मन्दिर भी बनवाया था। चेरों का इतिहास चोलों और पाण्ड्यों के साथ निरन्तर युद्ध का इतिहास है। यद्यपि चेरों ने चोल नरेश कारिकाल के पिता का वध कर दिया, लेकिन चेर नरेश को भी अपनी जान गँवानी पड़ी। बाद में दोनों राज्य कुछ समय के लिए मित्र बन गए और अन्ततः दोनों वैवाहिक संबंधों से भी जुड़ गए। आगे चलकर चेर राजा ने चोलों के खिलाफ पाण्ड्य शासकों से गठजोड़ किया। लेकिन चोलों ने दोनों को हरा दिया। कहा जाता है कि चेर राजा ने पीठ में घाव लगने के कारण लज्जावश आत्महत्या कर ली। चेर कवियों के अनुसार उनका सबसे बड़ा शत्रु हुआ लाल या भला चेर सेंगुत्तुवन। उसने अपने शत्रुओं का संहार किया और अपने भाई को सुरक्षित रूप में राजसिंहासन पर बैठा दिया। कहा जाता है कि उसने उत्तर दिशा में चढ़ाई की और गंगा को पार किया। लेकिन यह सब अतिरंजित लगता है। ईसा की दूसरी सदी के बाद चेर शक्ति का हृास हुआ और उसके बाद ईसा की आठवीं सदी तक उसके इतिहास के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है। इन तीनों राज्यों के राजनैतिक इतिहास की मुख्य दिलचस्पी इनके अपने बीच तथा श्रीलंका के साथ लगातार होते रहे युद्धों की कहानी में है। युद्धों के कारण ये राज्य कमजोर तो अवश्य हुए परन्तु अपने प्राकृतिक संसाधनों और विदेश व्यापार से काफी लाभ उठाते रहे। वे मसाले, विशेषकर गोल मिर्च उपजाते थे, जिनकी पश्चिमी दुनिया में बहुत माँग थी। उन्हें अपने हाथियों से दाँत मिलते थे जो पश्चिम में काफी मूल्यवान समझे जाते थे। समुद्र से मोती प्राप्त होते थे और खानों से रत्न और इन दोनों चीजो का निर्यात पश्चिम में भारी मात्रा में होता था। इनके अलावा, वे मलमल और रेशम भी पैदा करते थे। हम सुनते हैं कि उनका कपड़ा साँप के केंचुल जैसा पतला होता था। प्राचीन तमिल काव्यों में रेशम के ऊपर तरह-तरह की नक्काशीदार बुनाई का वर्णन किया गया है। उरैऊर का कपास व्यापार नामी था। प्राचीन काल में तमिल लोग एक ओर मिश्र और अरब के यूनानी या हेलोनिस्टिक राज्य के साथ और दूसरी ओर मलय द्वीपसमूह के साथ और वहाँ से चीन के साथ व्यापार करते थे। व्यापार के फलस्वरूप चावल, अदरख, दालचीनी आदि कई वस्तुओं के नाम यूनानी भाषा में तमिल भाषा से लिए गए हैं। जब ईसा की पहली सदी के आसपास मिश्र रोम का एक प्रान्त हो गया और मानसून का पता लग गया, तब इस व्यापार को अपार बल मिल गया। इस तरह ईसा की आरिम्भक ढाई सदियों तक रोम के साथ दक्षिण के राज्यों का लाभप्रद व्यापार चलता रहा। इस व्यापार में हृास होने के साथ इन राज्यों का सितारा भी डूबता गया। पैसा और तलवारस्थानीय और सुदूर दोनों तरह का व्यापार राजकोष के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण स्रोत था। हमें मालूम है कि चुंगी अधिकारी पुहार में किस तरह काम करते थे। जो सौदागर माल लेकर एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे उनसे भी पारगमन शुल्क वसूल किया जाता था। सौदागरों की सुरक्षा के लिए तथा तस्करी रोकने के लिए सड़कों पर सैनिक लगातार चौकसी करते रहते थे।युद्ध में हाथ लगे माल से भी राजकोष में वृद्धि होती थी। परन्तु युद्ध और राज्यव्यवस्था का वास्तविक आधार कृषि से होने वाली नियमित आय ही था। खेती की उपज का कितना हिस्सा राजा का पावना होता था और कितना वसूला जाता था इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है। प्रायद्वीप का नुकीला भाग और उससे लगे क्षेत्र बहुत ही उपजाऊ थे। खेतों में धान, रागी और ईख की उपज होती थी। कावेरी डेल्टा के बारे में कहावत है कि जितनी जमीन में एक हाथी लेट सकता है उतनी जमीन सात आदमियों का पेट भर सकती है। इन सभी के अतिरिक्त, तमिल प्रदेश में अनाज, फल, गोल मिर्च और हल्दी की उपज होती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि इन सभी उपजों में राजा का अंश होता था। स्पष्टतः किसानों से वसूले गए करों से राज्य एक मामूली सेना रखता था। इस सेना में बैल जुते रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदल सिपाही रहते थे। युद्ध में हाथी शानदार काम करते थे। घोड़े समुद्र के रास्ते पांड्य राज्य में बाहर मँगाए जाते थे। सामन्त और राजकुमार या सेनापति हाथी पर चढ़ते थे और सेनानी (कमांडर) रथ पर। पैदल सिपाही और घुड़सवार पाँव की रक्षा के लिए चमड़े की पनही (जूता) पहनते थे। सामाजिक वर्गों का उदयव्यापार से, युद्ध में हाथ लगे धन से और खेती की उपज से जो आय होती थी उससे राजा वेतन-भोगी सैनिकों के दलों को तो रख ही सकता था, साथ-साथ चारणों और पुरोहितों का भी सम्पोषण करता था, जिनमें मुख्यतः ब्राह्मण रहते थे। तमिल भूमि में ब्राह्मण का दर्शन सबसे पहले संगम युग में होता है। आदर्श राजा वह होता था जो ब्राहाण को कभी सताए नहीं। बहुत से ब्राह्मण कवि के रूप में नियोजित थे और इस काम में वे राजा से उदारतापूर्ण पारितोषिक पाते थे। कहा जाता है कि राजा कारिकाल ने एक कवि को 16,00,000 स्वर्ण मुद्राओं से पुरूस्कृत किया था। स्वर्ण के अतिरिक्त, कवियों और भाटों को नकद, भूमि, रथ घोड़े, और हाथी भी दिए जाते थे। तमिल ब्राह्मण मदिरा पीते और माँस खाते थे। क्षत्रिय और वैश्य संगम साहित्य में नियमित वर्ण के रूप में दिखाई देते हैं। किन्तु योद्धाओं का वर्ग राज्यव्यवस्था और समाज का एक महत्वपूर्ण अंग था। सेनाध्यक्षों को एक औपचारिक अनुष्ठान के साथ एनाडि की उपाधि दी जाती थी। चोल और पांड्य दोनों राज्यों में असैनिक और सैनिक दोनों तरह के अधिकारियों के पद पर वल्लाल या धनी किसान रखे जाते थे। शासक वर्ग को अरसर कहा जाता था और उस वर्ग के लोगों का वल्लालों से वैवाहिक सम्बन्ध होता था, जबकि वल्लाल चौथी जाति में आते थे। अधिकतर भूमि वल्लालों के हाथ में थी और उन्हीं से किसान वर्ग बना था। उनमें धनी और गरीब दोनों थे। धनी लोग स्वयम् खेती नहीं करते थे, यह कार्य वे मजदूरों से कराते थे। खेत-मजदूर का काम सबसे निचले वर्ग के लोग कडैसियर करते थे, जिन की हैसियत में गुलामों की हैसियत से नाम मात्र का अन्तर था।कुछ कारीगर खेत मजदूर वर्ग के भी थे। परियार लोग खेत-मजदूर थे, लेकिन पशु की खाल या चर्म का काम करते थे और चटाई के रूप में उसका इस्तेमाल करते थे। कई अन्त्यज और वनवासी कबायली लोग भयानक दरिद्र और अकिंचन थे। संगम युग में हम तीव्र सामाजिक विषमताएँ पाते हैं। धनी लोग सुर्खी और ईंट के मकानों में रहते थे और गरीब लोग झुग्गियों और झोपड़ियो में। नगरों में धनी व्यापारी लोग अपने घर के ऊपरी तल्ले में रहते थे। लेकिन यह ज्ञात नहीं है कि सामाजिक विषमता बनाए रखने में धर्म और अनुष्ठान का हाथ था या नहीं। हम ब्राह्मण और क्षत्रिय को तो जाति के रूप में स्थापित होते पाते हैं, परन्तु बाद में जिस तरह का प्रखर जाति-भेद दिखाई देता है वह आरम्भिक संगम युग में नहीं था। ब्राह्मण संस्कृति का आरम्भतमिल देश में ईसा सन् की आरम्भिक सदियों में जो राज्य और समाज स्थापित हुए उनका विकास ब्राह्मण संस्कृति के प्रभाव से हुआ। लेकिन ब्राह्मण संस्कृति का यह प्रभाव तमिल भूमि के एक छोटे से भाग में ही सीमित था। राजा वैदिक यज्ञ करते थे। वेदानुयायी ब्राह्मण लोग शास्त्रार्थ करते थे। परन्तु पहाड़ी प्रदेशों के लोगों के मुख्य स्थानीय देवता मुरूगन थे, जो आरम्भिक मध्य काल में सुब्रामनियम या सुब्रह्मण्यम कहलाने लगे। विष्णु की पूजा का भी उल्लेख है, लेकिन यह परम्परा बाद में चली होगी। मृतकों को जीवनापयोगी वस्तु अर्पित करने की महापाषाणिक प्रथा चलती रही। लोग मृतक को धान चढ़ाते थे। शवदाह की प्रथा आरम्भ हुई, परन्तु महापाषाण अवस्था से चली आर रही दफनाने की प्रथा समाप्त नहीं हुई।तमिल भाषा और संगम साहित्यऐतिहासिक काल के आरम्भ में तमिल लोगों के जीवन के संबंध में ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका आधार संगम साहित्य है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, संगम तमिल कवियों का एक संघ या सम्मेलन था, जो सम्भवतः किसी सामन्त या राजा के आश्रय में आयोजित होता था। परन्तु यह ज्ञात नहीं है कि संगम की संख्या कितनी थी और कब-कब बैठकें होती थीं। ईसा की आठवीं सदी में लिखी गई संगम की तमिल टीकाओं में कहा गया है कि तीन संगम 9,990 वर्ष तक चलते रहे, उनमें 8,598 कवि जुटते थे और 197 पाण्ड्य राजा उनके सम्पोषक थे। यह सब चरम सीमा का अतिरंजन मात्र है। केवल इतना ही कहा जा सकता है कि मदुरा में संगम राजाश्रय में आयोजित होते थे।इन संघों द्वारा रचित संगम साहित्य, जो उपलब्ध है लगभग 300 ई. और 600 ई. के बीच संकलित किया गया। परन्तु इसके कुछ भाग बहुत पुराने, कम से कम ईसा-पूर्व दूसरी सदी के प्रतीक होते हैं। संगम मोटे तौर पर दो समूहों में बाँटा जा सकता है - आख्यानात्मक और उपदेशात्मक। आख्यानात्मक ग्रन्थ मेल्कनक्कु अर्थात् अठारह मुख्य ग्रन्थ कहलाते हैं। इनमें अठारह मुख्य ग्रन्थ हैं - आठ पद्य संकलन और दस ग्राम्य गीत। उपदेशात्मक ग्रन्थ किल्कनक्कु अर्थात् अठारह लघु ग्रन्थ कहलाते हैं। संगम ग्रन्थों में सामाजिक विकास की झलकदोनों तरह के संगम ग्रन्थों में समाज के विकास की कई अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। इनमें आख्यानात्मक ग्रन्थों को वीरगाथा काव्य कहते हैं, जिनमें वीर पुरूषों की कीर्ति गाई गई है और निरन्तर चल रहे युद्धों और पशु-हरणों का बारंबार उल्लेख है। इससे लक्षित होता है कि तमिल लोग आरम्भ में पशुचारक थे। आरम्भिक महापाषाण जीवन का आभास संगम साहित्य में मिलता है। सबसे पुराने महापाषाणिक लोग मूलतः पशुचारक, शिकारी या मछुए मालूम होते हैं, हालाँकि वे चावल भी पैदा करते थे। प्रायद्वीपीय भारत में कई स्थलों में हँसिया और फावड़े तो मिले हैं, लेकिन फाल नहीं मिला है। लोहे की अन्य वस्तुएँ हैं - कीलक (फन्नी), सपाट सेल्ट, बाणाग्र, लंबी तलवार और बर्छी, खूँटी और शूलाग्र, हार्सबिट (Horsebit) इत्यादि। ये हथियार मुख्यतः युद्ध और शिकार के हैं। इसका कुछ प्रतिरूप संगम साहित्य में मिलता है जिसमें निरन्तर युद्धों और पशुहरणों की चर्चा है। संगम ग्रन्थों से प्रकट होता है कि युद्ध की लूट एक अच्छा निर्वाह-साधन थी। उनमें यह भी कहा गया है कि जब वीर मारता है तो वह पत्थर के टुकड़े के तुल्य हो जाता है। यह हमें पत्थर के टुकड़ों के उस घेरे को याद दिलाता है जो महापाषाणिक लोगों की कब्रों पर बनाए जाते थे। शायद बाद में इसी से वीरकल स्थापित करने की प्रथा चली जिसमें गाय या अन्य वस्तुओं के लिए लड़ते-लड़ते मरने वाले वीरों के सम्मान में वीरकल अर्थात् वीर-प्रस्तर खड़ा किया जाता था। सम्भव है कि संगम साहित्य में वर्णित सामाजिक विकास की आरम्भिक अवस्था आरम्भिक महापाषाण अवस्था से सम्बद्ध हो।हमें आख्यानात्मक संगम ग्रन्थों से कुछ जानकारी राज्य के गठन के बारे में मिलती है, जिसमें सेना के नाम पर योद्धाओं के कुछ दल मात्र होते थे तथा कर-संग्रह प्रणाली और न्याय व्यवस्था आरम्भिक अवस्था में थी। इन ग्रन्थों से हमें व्यापारियों, वणिकों, शिल्पियों और कृषकों के बारे में भी कुछ सूचनाएँ मिलती हैं। इनमें कई नगरों का उल्लेख है, जैसे कांची, कोकई, मदुरै, पुहार और उरेऊर। उनमें पुहार या कावेरीपट्टनम सबसे प्रसिद्ध था। संगम में जिन नगरों और आर्थिक कार्यकलापों की चर्चा है उनकी पुष्टि यूनानी और रोमन विवरणों से तथा संगम स्थलों पर हुई खुदाई से भी होती है। संगम ग्रन्थों का बहुत कुछ अंश, जिसमें उपदेशात्मक अंश भी शामिल है, संस्कृत और प्राकृत जानने वाले ब्राह्मण पण्डितों की रचना है। उपदेशात्मक ग्रन्थों में ईसा सन् की आरम्भिक सदियाँ आई हैं और उसमें न केवल राजा और राजसभा के लिए, बल्कि विविध सामाजिक और व्यावसायिक वर्गों के लिए भी आचार-नियम बताए गए हैं। यह सब ईसा की चौथी सदी के बाद ही सम्भव था, जब पल्लव राजाओं के आश्रय में बड़ी संख्या में ब्राह्मण आए। ग्रन्थों में ग्रामदान का तथा राजाओं के सूर्यवंश और चंद्रवंश का भी उल्लेख है। यह प्रथा उत्तर भारत में ईसा की छठी सदी के आसपास शुरू हुई है। संगम ग्रन्थों के अतिरिक्त एक और ग्रन्थ है जो तोल्कप्पियन कहलाता है। यह व्याकरण और अलंकारशास्त्र का ग्रन्थ है। एक और महत्वपूर्ण तमिल ग्रन्थ है तिरूक्कुरल, जिसमें दार्शनिक विचार और सूक्तियाँ हैं। इसके अलावा, तमिल के दो प्रसिद्ध महाकाव्य हैं जिनके नाम हैं सिलप्पदिकरम और मणिमेकलै। इन दोनों की रचना ईसा की छठी सदी के आसपास हुई। इनमें पहला महाकाव्य तमिल साहित्य का उज्जवलतम रत्न माना जाता है। इसमें एक प्रेम-कथा वर्णित है। कोवलन नामक एक अमीर अपनी कुलीन धर्मपत्नी कन्नगी की उपेक्षा करके कावेरीपट्टनम की माधवी नामक एक वेश्या से प्रेम करता है। लगता है इसके रचियता जैन था और तमिल देश के सभी राज्यों को कथा-स्थल बनाना चाहता था। दूसरा महाकाव्य मणिमेकलै मदुरा के एक बनिया का लिखा है जो अनाज का व्यापार करता था। इसमें कोवलन और माधवी के संगम से उत्पन्न एक कन्या के साहसिक जीवन का वर्णन है, लेकिन यह महाकाव्य धार्मिक अधिक है, साहित्यिक कम। दोनों महाकाव्यों की प्रस्तावना में कहा गया है कि वे ईसा की दूसरी सदी में राज करने वाले चेर राजा सेंगुटूटूवन के मित्र और समकालीन थे। ये दोनों महाकाव्य उतनी प्राचीन तो नहीं हो सकते हैं, फिर भी इनमें ईसा की छठी सदी तक के तमिलों के सामाजिक और आर्थिक जीवन का आभास मिलता है। इसमें सन्देह नहीं है कि तमिल लोग ईसा सन् के आरम्भ के पहले से ही लिखना जानते हैं। ब्राह्मी लिपि में लिखे 75 से भी अधिक छोटे-छोटे अभिलेख प्राकृतिक गुहाओं में, विशेषकर मदुरा प्रदेश में पाए गए हैं। इन में प्राकृत शब्दों से मिश्रित तमिल भाषा का प्राचीनतम स्वरूप दिखाई देता है। ये ईसा पूर्व दूसरी-पहली सदियों के हैं, जब जैन और बौद्ध धर्मप्रचारकों का इस इलाके में प्रवेश हुआ। कई स्थानों में हाल में हुए उत्खननों में अभिलेखित मृदभांडों के टुकड़े पाए गए हैं। इनसे पता चलता है कि ईसा सन् के आरम्भ में तमिल भाषा कैसी थी। अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि संगम साहित्य के प्रचुर अंश ईसा सन् की आरम्भिक सदियों में लिखे गए, हालाँकि उनका अन्तिम संकलन 600 ई. के आसपास हुआ। | |||||||||
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